गुरुवार, 20 मई 2010

दिशिता

दिशिता का अर्थ दिशा की तारतम्यता से है । दिशा के लिए दिश तथा दिक् भी प्रयोग में आता है । नियत स्थान के अतिरिक्त शेष विस्तार को दिशा कहा जाता है । ओर संज्ञा भी दिशा के लिए प्रयुक्त होती है । क्षितिज -वृत्त के चार विभाग किए गये हैं । इन्हें पूर्व ,पश्चिम ,उत्तर तथा दक्षिण दिशा कहा गया है । क्रमश: प्रत्येक दो दिशाओं में एक- एक कोण भी दी गये हैं । ये कोण अग्नि ,नेरृति ,वायु और ईश नाम से जाने जाते हैं । एक दिशा ऊर्ध्व और दूसरी दिशा अध: होती है , पहली दिशा का पालक देवता ब्रह्मा और दूसरी दिशा का पालक देवता अनंत है । इस प्रकार दस दिशाएं हैं । दिशाओं में से किसी एक दिशा को अपना लक्ष्य बना कर प्रगति करनी होती है । सही दिशा का चयन एक बहुत महत्त्वपूर्ण निर्णय होता है । अन्यथा दिग-भ्रम की स्थिति हो जाती है । स्व-केंद्र स्वयं निर्धारित करना होता है । स्वयं अपनी दिशा को निर्धारित कर प्रगति करनी होती है । इस स्थिति - मन में लक्ष्य की पूर्ण प्राप्ति होती है । दिशा-वृत्त में केंद्र-बिंदु बन कर दिशा की तारतम्यता बनाये रखना ही दिशिता है । इसे ही दिशा -बोध कहा जा सकता है । निश्चित लक्ष्य,पक्का इरादा ,दूर -दृष्टि ही दिशिता का पूर्ण मंतव्य है । उचित दिशा-बोध ही वस्तुत: है--- दिशिता

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