गुरुवार, 20 मई 2010

अन्विता

अन्विता से तात्पर्य संयुक्त्त होने से है । संयुक्त किस से होना और क्यों ? आत्मा -परमात्मा से संयुक्त स्थिति को भी अन्विता के रूप में देखा जा सकता है । पहले अन्विता का व्याकरणिक स्वरूप को देखना चाहिए । व्याकरणिक दृष्टि से जिसका अन्वय हुवा हो ,उसे अन्विता कहा जाता है । अर्थ की दृष्टि से अन्विता परस्पर सम्बन्ध ,मेल ,वाक्य की शब्द -योजना ,वंश , कुल आदि के लिए आता है । अन्विता जीवन में तारतम्यता को प्रस्तुत करती है ,तारतम्यता का तात्पर्य जीवन में सूत्रबद्धता से है । जीवन में प्रत्येक कार्य सुनियोजित एवं सुसम्बद्ध करना ही अन्विता का भाव प्रकट करता है । कार्य-कारण की स्थिति का न्याय स्पष्ट्त: संकेत करता है कि बिना कारण के कोई कार्य कभी भी नहीं हो सकता । जैसे स्पष्ट है कि बिना बादल के बरसात नहीं होती ; धूप है तो सूर्य भी है। उसी प्रकार प्रत्येक प्रत्यक्ष कार्य का कोई न कोई अवश्य ही अप्रत्यक्ष कारण होता है। यह न्याय ही अन्विता-बोध है । एक तरह से एक बात की सिद्धि से दूसरी बात की सिद्धि - योग ही अन्विता -सूचक है। एकतानता का अर्थात यूनिटी का रूप भी अन्विता है। अन्विता दुर्गा का भी एक नाम है। क्योंकि दुर्गा ही व्यक्ति को प्रेरित है कि वह काली माई का वीभत्स रूप छोढ़कर सात्विक दुर्गम रूप धारण करे , सत मार्ग पर चलना कोई सहज कार्य नहीं है ,सत और असत में अन्वित्त -बोध ही अन्विता है ।

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