मंगलवार, 1 जून 2010

चैतन्य- केंद्र प्रेक्षा

चैतन्य- केंद्र प्रेक्षा की मुख्य निष्पत्तियां हैं--भावों का परिष्कार , स्वभाव एवं आदतों में परिवर्तनं , ज्ञान , आनंद ,और शक्ति का जागरण। हमारे शरीर में कुछ ऐसे स्थान हैं , जहाँ चैतन्य दूसरे अवयवों की अपेक्षा अधिक सघन होता है। इसलिए इन्हें चैतन्य केन्द्रों की संज्ञा दी गयी है। हमारे शरीर के दो मुख्य तंत्र हैं--एक नाड़ी-तंत्र और दूसरा ग्रंथि- तंत्र । नाड़ी -तंत्र में हमारी सारी वृत्तियाँ अभिव्यक्त होती हैं, ये अनुभव में आकर व्यवहार में उतरती हैं। व्यवहार अनुभव एवं अभिव्यक्ति ये नाड़ी - तंत्र के कार्य हैं। किन्तु आदतों का जन्म ग्रंथि -तंत्र में ही होता है। ये ही आदतें मष्तिष्क तक पहुंचती है, अभियक्त होती है। चैतन्य केन्द्रों की प्रेक्षा करने से अंत:स्रावी ग्रंथियों के साथ परिष्कृत होते हैं। चित्त का यह स्वभाव है कि वह सिर से लेकर पैर तक चक्कर लगाता रहता है। हृदय , कंठ , और मष्तिष्क -- ये तीन स्थान साधना में बहुत उपयोगी हैं। हृदय आनन्द - केंद्र, कंठ विशुद्धि - केंद्र और मष्तिष्क ज्ञान - केंद्र है चैतन्य केंद्र का प्रारम्भ शक्ति- केंद्र कि प्रेक्षा से होता है और एक-एक चैतन्य केंद्र की प्रेक्षा करते हुवे ज्ञान-केंद्र तक चित्त की यात्रा की जाती है।

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