मंगलवार, 1 जून 2010

समर्थ

समर्थ का भाव- वाचक रूप सामर्थ्य है । सम अर्थात समान अर्थ होने की अवस्था का भाव सामर्थ्य है । सामर्थ्य का प्रयोग सदा मनुष्यों या अधिक से अधिक जीव- जन्तुओं तक के सम्बन्ध में होता है, वस्तुओं आदि के सम्बन्ध में नहीं। क्योंकि यह मुख्यत: आर्थिक, मानसिक , शारीरिक , आदि शक्तियों पर आधारित होता है और परिस्थितियों के अनुसार घटता- बढ़ता रहता है। किसी कार्य का विशिष्ट प्रकार कर सकने का जो गुण या बल होता है , उसी का सूचक सामर्थ्य है। सक्षम या समर्थ होने की अवस्था एवं योग्यता का रूप सामर्थ्य है। सम - भाव ही जिसका अर्थ है वही समर्थ है। सुख - दुःख , लाभ- हानि, जय- पराजय आदि में जो समता भाव रखता है , वही समर्थ है। अर्जुन के समान जो युद्ध में स्थिर रहता है वही समर्थ है। वह कर्म - क्षेत्र से कभी भी पलायन नहीं करता। समर्थ व्यक्ति तन से जहाँ समर्थ होता है , वह वहां मन से भी समर्थ होता है। प्राण- चेतना भी उसे सदैव समर्थ बनाती रहती है। सत- चित- आनन्द ही समर्थ का पूर्ण उद्देश्य होता है। चार पुरुषार्थ अर्थात अर्थ से संयुक्त व्यक्ति ही समर्थ होता है। वह धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की सिद्धि में समर्थ होता है। समर्थ व्यक्ति पूर्ण रूप से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में समर्थ होता है। जिस प्रकार भगवान राम ने सम- अर्थ भाव रखा और उन्होंने राज्याभिषेक एवं वनवास को सम- अर्थ में ही ग्रहण किया। परिणामत: वे हमारे आदर्श बन गये। समर्थ व्यक्ति आदर्श ही बन जाता है।

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