मंगलवार, 1 जून 2010

सौरभ

सौरभ सुगंध का पर्यायवाची है, यश, कीर्ति एवं वैभव को विस्तारित करने वाला है। इसको खुशबु और महक के नाम से भी जाना जाता है। एक कवि ने कहा है--"व्याकुल उस मधु सौरभ से मलयानिल धीरे - धीरे "। सौरभ को आंसू भी कहा गया है ; क्योंकि आंसू भी मन के भाव को अभिव्यक्त करने का एक साधन है। आंसू के माध्यम से व्यक्ति अपने दुःख को संयोजित कर अपनी संवेदना को प्रशस्त कर अक्षय कीर्ति का संभागी बनता है। वह अपने भाव को सामाजिक समरसता प्रदान करता है। सौरभ को केसर भी कहा जाता है । केसर जहाँ सुगंध का वाची है , वहां वह रंग में प्रेम , सात्विकता और बलिदान का सूचक है। इसके साथ-साथ यह आध्यात्मिकता में परम- प्रिय के संयोग का भी प्रतीक है। आम को भी सौरभ का प्रतीक माना गया है। आम का वृक्ष धार्मिक दृष्टि से जहाँ पवित्र माना गया है ; वहां इसके पत्तों का बन्दनवार में प्रयोग किया जाता है। धार्मिक अनुष्ठान में इसके प्रयोग के पीछे प्रमुख कारण यह है कि इस वृक्ष पर कभी भी पतझढ़ नहीं आता। यह प्रकृति का अद्भुत उपहार है। सदैव खिलने वाला यह वृक्ष प्रकृति के सौरभ का श्रृंगार है। छंद - रचना में सौरभ एक वर्ण -वृत्त है ; जिसमें वेदों कि अनेक रचनाओं का विस्तार हुवा है। वस्तुत: सौरभ एक विविध आयामी शब्द - योजना है। यह प्रकृति के सार- तत्त्व को प्रस्तुत करता है। सौरभ से अपने मन की सुगंधी को विस्तारित किया जा सकता है। सौरभ का साक्षात् सम्बन्ध नासिका अर्थात प्राण- तत्त्व से है। इसी प्राण- योजना को महा-प्राण से संयोजित कर सौरभ -मय बनाया जा सकता है ।

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