शुक्रवार, 4 जून 2010

विदुषी

विदुषी पंडिता स्त्री को कहा जाता है। भारतीय साहित्य में अनेक विदुषी महिलाओं का वर्णन प्राप्त होता है। नारी को संसार का सबसे बहुमूल्य रत्न कहा गया है। वेद के अनुसार नारी को परिवार रूपी वृत्त का व्यास अथवा ध्रुव - बिंदु कहा गया है। वैदिक युग में पुरुषों के समान नारी को भी यज्ञादि अनुष्ठान करने और वेदादि शात्रों के पठन- पाठन का पूर्ण अधिकार था। अर्थात नारी विदुषी हुवा करती थी। ऋग्वेद के अनुसार उपनयन - यज्ञोपवीत संस्कार भी होता था। " यज्ञे दधे सरस्वती " का तात्पर्य -- सरस्वती के रूप में नारी ही है। वैसे भी विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती और शारदा ही हैं ; यह भी नारी के विदुषी होने का सर्वप्रमुख प्रमाण ही है। वैदिक ऋषियों में घोषा , विश्ववारा आदि तथा उपनिषदों में गार्गी ,मैत्रेयी आदि विदुषी नारियों का उल्लेख मिलता है। व्याकरण,दर्शन एवं शास्त्रों को पढ़ाने वाली विदुषी नारी को उपाध्याया और आचार्या के गौरवपूर्ण विशेषण दिए गये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वैदिक युग में नारी का स्थान एक प्रकार से पुरूष से भी ऊंचा माना जाता था ; उस समय नारी का विदुषी रूप उभर कर आता था। वेद में नारी को सम्राज्ञी और पुरन्ध्री आदि कह कर उसे गौरवान्वित किया गया है। जिस कुल में नारी कि पूजा होती है , अर्थात उसका सत्कार होता है, उस कुल में दिव्य गुण , दिव्य भोग दिव्य संतान का वास होता है। जिस कुल में इनकी पूजा नहीं होती ; उस कुल के सुख - प्राप्ति के सभी उपाय निष्फल होजाते हैं। यथा --- " यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: । यत्र नास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला : क्रिया:॥ " वैदिक पुरुष वैदिक विदुषी नारी को ऋचा के समतुल्य मानता है। साथ ही वह उसे पृथ्वी के समान धृति - सम्पन्न एवं क्षमा- शीला भी स्वीकार करता है। नारी के विदुषी रूप को स्पष्ट करते हुवे मनु महाराज का कथन है कि --- दस उपाध्यायों की अपेक्षा आचार्य , सौ आचार्यों की अपेक्षा पिता और हजार पिताओं की अपेक्षा माता का महत्त्व अधिक होता है। उपनिषदों में नारी को अग्नि- स्वरूपा कहा गया है। वास्तव में पुरुष और नारी एक ही तेज की दो ज्योतियाँ हैं। यदि पुरुष जीव रूप में विचरण करता है तो नारी बुद्धि बन कर उसे सहयोग प्रदान करती है; यह नारी के तेजस्विता एवं विदुषी-मय स्वरूप को अभिव्यक्त करता है। पुरुष यदि क्रोध है तो नारी शांति है, नर यदि नद है तो नारी नदी है ; नर यदि भर्ता है तो नारी भार्या है ; नर यदि गृहपति है तो नारी गृहलक्ष्मी है। वास्तव में गृहलक्ष्मी की यह भावना ही नारी के उदात्त रूप को अनुभूति प्रदान करती है। "दुर्गा सप्तशती " में नारी विविध रूपों में वन्दनीय एवं वन्दिता है। मातृरूप जहाँ विशेष रूप से अभिव्यक्त हुवा है वहां बुद्धि रूप में उसकी प्रार्थना कर उसके विदुषी रूप की अभ्यर्थना की गयी है। यहाँ तक माता को गुरु के रूप में स्वीकार क्या गया है। संस्कृत वांग्मय में ऐसे अनेक प्रसंग हैं , जिसमें नारी को त्रैलोक्य की माता , त्रिभुवन का आधार और शक्ति का स्रोत सिद्ध किया गया है। एक स्थल पर शिवजी ने पारवती के माध्यम से नारी के सम्बन्ध में यह कहा है कि नारी के समान न सुख है , न गति है , न भाग्य है, न राज्य है, न तप है, न तीर्थ है, न योग है, न जप है, न धन है और न मंत्र है। नारी के समान इस धरा- धाम पर न कुछ था , न है और न होगा। उन्हों ने नारी को पूजनीया एवं मनीषा में परम विदुषी स्वीकार क्या है। वेद में भी '' मात्रिमान पित्रिमान आचार्यवान पुरुषो वेद " के अनुसार माता को विदुषी के रूप में सर्वप्रथम गुरु बताया गया है। महाभारत में भी द्रौपदी और उत्तरा को पूर्ण विदुषी कहा गया है। विदुषी नारी ही श्रद्धेय है , यथा --- "नारी ! तुम श्रद्धा हो , विश्वास रजत नग पगतल में । पीयूष - स्रोत - सी बहा करो , जीवन के सुन्दर समतल में॥ "

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