शुक्रवार, 4 जून 2010

विनम्र

विनम्र का अर्थ है-- विशेष रूप से नम्र। विनम्रता तभी सामने आएगी जब आदमी दूसरों के सामने एवं उनके आगे कुछ झुकेगा, उनके प्रति विशेष आदरभाव दिखलायेगा। विनम्रता यद्यपि शिष्टता का एक बहुत बड़ा और आवश्यक अंग है। तो भी दोनों के प्रयोग और स्वरूप में कुछ अंतर है। विनम्रता का उपयोग और प्रयोग उन्हीं क्षेत्रों में हो सकता है, जहाँ पद, मर्यादा, उम्र, शिक्षा आदि की कुछ समानता होती है। नौकर के सामने मालिक या शिष्य के सामने गुरु विनम्र नहीं हो सकता। इसका उचित प्रयोग मनुष्य का सामाजिक रहन- सहन चमका देता है और यह प्राय: शिष्टता से भी कुछ आगे बढ जाती है। शिष्टता में तो अवसर आने पर ही दूसरों को प्रसन्न तथा संतुष्ट किया जाता है , पर विनम्रता दूसरों को प्रसन्न एवं संतुष्ट करने के अवसर खोजा करती है। शिष्टता से हम इतना ही कर सकते हैं कि दूसरों को दुखी नहीं होने दें , पर विनम्रता हम दूसरों को प्रसन्न करने के अतिरिक्त अपने उत्कृष्ट मानसिक तथा हार्दिक गुणों का भी परिचय देते हैं। भोजन के लिए अपने यहाँ कुछ मित्रों को बुला कर उनके खाने- पीने आदि की सब व्यवस्था अपने घर के अन्य सदस्यों से कराना तो शिष्टता है , पर हर मित्र के पास बार-बार जाकर उसकी आवश्यताएँ पूछना , उनकी हर आवश्यकता की पूर्ति का स्वयं और व्यक्तिगत तत्परता-पूर्ण ध्यान रखना आदि बातें विनम्रता के क्षेत्र में आती हैं। क्योंकि ऐसे व्यक्ति बडप्पन भूल कर अपने मित्रों एवं साथियों के आगे झुकते हैं। वैसे तो बोल- चाल विनय भी बहुत कुछ वही है, फिर विनय अपेक्षा कृत बहुत व्यापक अर्थ का सूचक है। विनय का सामान्यत: अर्थ अलग या दूर हो जाना है। पर बाद में विनय शब्द मनुष्य की एक विशिष्ट चारित्रिक , मानसिक और व्यावहारिक स्थित्ति का वाचक हो गया है । अच्छे कुल में उत्पन्न , गुणी, विद्वान् सुयोग्य व्यक्ति में मानवोचित विशेषताओं के साथ- साथ इन गुणों का बिलकुल भी जब अभिमान नहीं होता तब इस भाव को विनय कहते हैं। व्यवहार में विनय को नम्रता , लज्जा , संकोच आदि की नामों से भी जाना जाता है । हमारे शास्त्रों में विनय को अत्यधिक महत्व दिया गया है। विनय से ही विनयशील बनता है और विनम्र से विनम्रता का भाव - बोध होता है। विनय के माध्यम से व्यक्ति जब विद्या प्राप्त करता है तभी उसे योग्यता प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति ही अपनी योग्यता के द्वारा धन की प्राप्ति करता है। धन से सीधा सुख नहीं, अपितु वह धन धर्म की प्राप्ति के लिए अर्जित करता है। धर्म के बाद ही विनम्र व्यक्ति सुख की अभिलाषा कर परम सुख एवं आनंद को प्राप्त करना चाहता है। इस प्रकार विनम्र व्यक्ति अपनी विद्या को योग्यता का आधार बनाकर धन को धर्म का आधार बनाता है। अतः विनम्र - भाव परम सुख की प्राप्ति करा सकता है।

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