शुक्रवार, 4 जून 2010

वन्दिता

वन्दिता स्त्री वाचक है। जिसकी वन्दना की जाती है ; वह वन्दिता होती है। वन्दिता प्रणाम करने योग्य होती है। वन्दिता की स्तुति की जाती है। वंदन योग्य ही वन्दिता होती है। वह आदर के योग्य एवं पूजित होती है। उसके प्रति पूज्य तथा पूजनीय भाव सदा बना रहता है। वंदना उसी की जाती है, जो हम से श्रेष्ठ होता है। वन्दनीय व्यक्ति अपने नाम , रूप और गुणों के कारण ही पूज्य होता है। वंदना करने वाला व्यक्ति अपने पूज्य का स्मरण उसके नाम से, उसके रूप और उसके गुणों से करता रहता है। वंदना करने से मन में विनम्र -भाव की अनुभूति होती है। विनम्रता के साथ- साथ समर्पण का भाव भी सहज रूप से आता है। वन्दिता ऊर्ध्वमुखी प्रवृत्ति की परिचायक होती है । विदूषी होने के कारण पूज्य होती है।विदूषी होने के साथ - साथ वन्दिता अपने विविध सत्कार्यों के द्वारा भी पूजित होती है। वन्दित जहाँ देव होते हैं , वहां देवी वन्दिता होती है। आराध्य देव , माता- पिता और गुरु सदा ही पूज्यनीय होते हैं। कहीं तो आराध्य देव से भी अधिक माता-पिता को वन्दनीय माना गया है। माता को धरती के समान गहरा और पिता को आकाश से भी ऊंचा माना गया है। कबीर ने तो गुरु को गोविन्द अर्थात प्रभु से भी श्रेष्ठ स्वीकार किया है। इनका प्रसिद्द दोहा है---" गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागूँ पाय , बलिहारी गुरु आपनों गोविन्द दियो बताय ॥ " गुरु पर गोविन्द अर्थात प्रभु न्यौछावर है, क्योंकि प्रभु का मार्ग गुरु के माध्यम से ही प्राप्त होता है। जो पूजित की वंदना करता है , उसे सहज भाव से ही आयु , विद्या , यश और बल की प्राप्ति हो जाती है। यथा -- " अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन: , चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयु: विद्या यशोबलं ॥ " वस्तुत: वन्दनीय भाव का संयोजन जहाँ होता है , वहां शक्ति रूप में वन्दिता स्थित रहतीहै। वन्दिता शक्तिरूपा महा कल्यांकरिणी है , जो सदा मंगल- ही- मंगल करती है ।

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